कामिका एकादशी चतुर्मास की पहली एकादशी मानी जाती है, इस दौरान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में रहते हैं। मान्यता है कि चतुर्मास की एकादशी पर विष्णु भगवान की पूजा करने से बड़े से बड़ा संकट टल जाता है और सारे पापों से मुक्ति मिल जाती है।
कामिका एकादशी की कथा
कहा जाता है कि कामिका एकादशी के स्मरणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है । इस दिन श्रीधर, हरि, विष्णु, माधव और मधुसूदन आदि नामों से भगवान् का पूजन करना चाहिए ।कहते है कि भगवान श्रीकृष्ण/श्री विष्णु के पूजन से जो फल मिलता है, वह गंगा, काशी, नैमिषारण्य तथा पुष्कर क्षेत्र में भी सुलभ नहीं है। सिंह राशि के बृहस्पति में होने पर तथा व्यतीपात और दण्डयोग में गोदावरी स्नान से जिस फल की प्राप्ति होती है, वही फल भगवान् श्रीकृष्ण/श्री विष्णु के पूजन से भी मिलता है । जो समुद्र और वनसहित समूची पृथ्वी का दान करता है तथा जो ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करता है, वे दोनों समान फल के भागी माने गये हैं । जो ब्यायी हुई गाय को अन्यान्य सामग्रियों सहित दान करता है, उस मनुष्य को जिस फल की प्राप्ति होती है, वही ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करने वाले को मिलता है । जो नरश्रेष्ठ इस दिन भगवान् श्रीधर का पूजन करता है, उसके द्वारा गन्धर्वों और नागों सहित सम्पूर्ण देवताओं की पूजा हो जाती है ।
अत: पापभीरु मनुष्यों को यथाशक्ति पूरा प्रयत्न करके ‘कामिका एकादशी’ के दिन श्रीहरि का पूजन करना चाहिए । जो पापरुपी पंक से भरे हुए संसार समुद्र में डूब रहे हैं, उनका उद्धार करने के लिए ‘कामिका एकादशी’ का व्रत सबसे उत्तम है । अध्यात्म विधापरायण पुरुषों को जिस फल की प्राप्ति होती है, उससे बहुत अधिक फल ‘कामिका एकादशी’ व्रत का सेवन करने वालों को मिलता है । कहा जाता है कि ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करने वाला मनुष्य रात्रि में जागरण करके न तो कभी भयंकर यमदूत का दर्शन करता है और न कभी दुर्गति में ही पड़ता है । लालमणि, मोती, वैदूर्य और मूँगे आदि से पूजित होकर भी भगवान विष्णु वैसे संतुष्ट नहीं होते, जैसे तुलसीदल से पूजित होने पर होते हैं । जिसने तुलसी की मंजरियों से श्रीकेशव का पूजन कर लिया है, उसके जन्मभर का पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है ।
तुलसी जी के लिए कहा गया है कि,
या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी,
रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी ।
प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता,
न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम: ॥
‘जो दर्शन करने पर सारे पापसमुदाय का नाश कर देती है, स्पर्श करने पर शरीर को पवित्र बनाती है, प्रणाम करने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचने पर यमराज को भी भय पहुँचाती है, आरोपित करने पर भगवान श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान के चरणों मे चढ़ाने पर मोक्षरुपी फल प्रदान करती है, उस तुलसी देवी को नमस्कार है ।’
मान्यता है की जो मनुष्य एकादशी को दिन रात दीपदान करता है, उसके पुण्य की संख्या चित्रगुप्त भी नहीं जानते । एकादशी के दिन भगवान् श्रीकृष्ण के सम्मुख जिसका दीपक जलता है, उसके पितर स्वर्गलोक में स्थित होकर अमृतपान से तृप्त होते हैं । घी अथवा तिल के तेल से भगवान् के सामने दीपक जलाकर मनुष्य देह त्याग के पश्चात् करोड़ो दीपकों से पूजित हो स्वर्गलोक में जाता है ।
कामिका एकादशी सब पातकों को हरने वाली है, अत: मानवों को इसका व्रत अवश्य करना चाहिए। यह स्वर्गलोक तथा महान पुण्यफल प्रदान करने वाली है। जो मनुष्य श्रद्धा के साथ इसका माहात्म्य श्रवण करता है, वह सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में जाता है ।
कामिका एकादशी उत्तम फलों को प्रदान करने वाली होती है। इस एकादशी के दिन भगवान श्री कृष्ण/श्री विष्णु कीपूजा करने से अमोघ फलों की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि इस एकादशी का फल अश्वमेघ यज्ञ के समान होता है।
मान्यता है कि कामिका एकादशी व्रत के दिन श्री हरि का पूजन करने से व्यक्ति के पितरों के भी कष्ट दूर होते है। व्यक्ति पाप रूपी संसार से उभर कर, मोक्ष की प्राप्ति करने में समर्थ हो पाता है। इस एकादशी के विषय में यह मान्यता है, कि जो मनुष्य़ इस एकादशी को भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसके द्वारा गंधर्वों और नागों की सभी की पूजा हो जाती है। लालमणी मोती, दूर्वा आदि से पूजा होने के बाद भी भगवान श्री विष्णु उतने संतुष्ट नहीं होते, जितने की तुलसी पत्र से पूजा होने के बाद होते है। जो व्यक्ति तुलसी पत्र से श्री केशव का पूजन करता है। उसके जन्म भर का पाप नष्ट होते है।
लोकमान्यता के अनुसार इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही यज्ञ करने समान फल प्राप्त होते है। कामिका एकादशी के व्रत में श्री विष्णु जी की पूजा होती है। कहा जाता है कि जो मनुष्य इस एकादशी को धूप, दीप, नैवेद्ध आदि से भगवान श्री विष्णुजी की पूजा करता है उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
मान्यता है की कामिका एकादशी के शुभ अवसर पे धर्म कार्य में दान-पुण्य का कार्य करने से हर प्रकार के पापों और कष्टों से मुक्ति मिलती हैं। साथ में अपने पितरों ( पूर्वजों ) का आशीर्वाद भी प्राप्त होता हैं।
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